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Saturday, 31 July 2021

जातिवाद, क्षेत्रवाद से परे समूचे राष्ट्र के उन्नायक रहे लोकमान्य तिलक - शैलेष तिलक

कैलाश सिंह विकास वाराणसी

जातिवाद, क्षेत्रवाद से परे समूचे राष्ट्र के उन्नायक रहे लोकमान्य तिलक - शैलेष तिलक

100 वीं पुण्यतिथि पर डीएवी पीजी कॉलेज में आयोजित वेबिनार में उनके प्रपौत्र के विचार

वाराणसी, 31 जुलाई। डीएवी पीजी कॉलेज के इतिहास विभाग के तत्वावधान में महान क्रांतिकारी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की 100 वीं पुण्यतिथि पर उनके जीवन एवं विचारों पर एक दिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया। मुख्य वक्ता लोकमान्य तिलक के प्रपौत्र शैलेष श्रीकांत तिलक ने कहा कि उनके दैहिक अवसान के सौ वर्ष बाद भी तिलक के विचार उतने ही प्रांसगिक है जितने ब्रिटिश साम्राज्य मे थे। अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से अलग राष्ट्र के प्रति जागृति लाने वाली शिक्षा नीति की बुनियाद उन्होंने ही सबसे पहले रखी। उनका मत था कि लोकशिक्षा के जरिए ही समाज में बदलाव लाया जा सकता है। उनकी पत्रकारिता ने भी लोगों के दिल में क्रांति का बीजारोपण किया। उनकी मुखर लेखनी अंग्रेजी हुकुमत की ऑखों में सदैव किरकिरी बनी रही। शैलेष तिलक ने यह भी कहा कि तिलक जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद से परे समूचे भारत राष्ट्र के वह उन्नायक है जिन्होंने सिर्फ समाज के लिए जीवन समर्पित किया।
विशिष्ट वक्ता महाराष्ट्र के वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द गोखले ने कहा कि तिलक के जीवन को किसी सीमा से बांध कर नही देखा जा सकता है। तिलक ध्यान योगी और कर्म योगी दोनों ही रहे। समाज में व्याप्त कुरितियों के खिलाफ उनकी लड़ाई में विधवा लड़कीयों को शिक्षित कर उन्हें स्वावलम्बी बनाने की सोच उनके विराट व्यक्तित्व की गवाही देता है। उन्होंनें कहा कि काशी उनके लिए श्रद्धास्थल के समान रही और 1906 के राजघाट के कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने वह यहॉ आये।
अध्यक्षीय सम्बोधन में प्राचार्य डॉ. सत्यदेव सिंह ने कहा कि लोकमान्य तिलक अपने विचारों, कार्यो, सर्मपण और त्याग की भावना से देहावसान के 100 वर्ष बाद भी सबके विचारों में जिन्दा है। तिलक ने जिस प्रकार से स्वराज को अपना जन्मसिद्ध अधिकार बतलाया वह आज भी हमारे अन्दर आत्मचेतना की भावना जागृत करती है। महात्मा गांधी से पूर्व तिलक ही राष्ट्रीय एकता के ध्वजवाहक रहे, उनके द्वारा शुरू किया गया गणपति पूजन और उनकी पत्रकारिता ने सदैव देश को एकता के सूत्र में पिरोने का कार्य किया।
इस अवसर पर प्रो. आर.पी.पाठक, प्रो. बिन्दा परांजपे, प्रो. मानवेन्द्र पुण्डीर, डॉ. राजकुमार, डॉ. घनश्याम दूबे, डॉ. सतीश कुमार ंिसंह आदि प्रबुद्धजनों ने भी तिलक के जीवन दर्शन पर विचार व्यक्त किया। संयोजन डॉ. विनोद कुमार चौधरी, संचालन डॉ. शोभनाथ पाठक, डॉ. प्रतिभा मिश्रा एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. संजय कुमार सिंह ने दिया।


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