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Thursday, 26 August 2021

नदिया, लगभग, जीवनदायिनी का रूप खो चुकी है- डा० अनिल कुमार पाण्डेय

लेखक- डा० अनिल कुमार पाण्डेय

नदिया, लगभग, जीवनदायिनी का रूप खो चुकी है- डा० अनिल कुमार पाण्डेय

पृथ्वी का अमृत जल, जल ही जीवन है। पृथ्वी पर जीवन का आरंभ महासागरों के जल में माना जाता है। महासागरों के नीचे भी धरती है। जल में ही पहली बार जीवन का अंकुर फूटा था। तब से ही जल पृथ्वी पर जीवन का प्रतीक है। पृथ्वी पर जीवन के स्थायित्व के लिए जल की अहम भूमिका होती है। जल प्रदूषण से पेट,त्वचा संबंधी, प्रत्यक्ष ,अप्रत्यक्ष, नाना प्रकार की बीमारियां होती है। जल ही जीवन है। जल जीवन की  अनिवार्य आवश्यकता है। जल के बिना धरती पर जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। सदियों से जल जीवन का पोषण करता आया है, लेकिन हाल के वर्षों में जल संकट की समस्या के गहराने के साथ जल की गुणवत्ता में भी कमी देखी जा रही है। 

दरअसल, बढ़ता जल प्रदूषण, औद्योगिकरण और शहरीकरण के नकारात्मक पहलू के रूप में सामने आया है। अंधाधुंध और अनियंत्रित विकास के कारण, जल स्रोतों में अत्यधिक, अपशिष्ट पदार्थों के मिलने से जल स्रोतों का जल भारी मात्रा में प्रदूषित हुआ है। यह विचार करने योग्य बात है, कि कभी अमृत समझा जाने वाला माता गंगा, माता यमुना का पानी भी प्रदूषण का शिकार हुआ है। जल की इस स्थिति के लिए समाज और व्यक्तियों द्वारा ,रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून, जैसी पुरानी और सार्थक कहावतों को भूल कर, पानी को संचय, करने की हजारों साल पुरानी परंपराओं को भूलना भी शामिल है। आज  औद्योगिकरण, गहन कृषि तथा शहरीकरण के चलते हमने नदियों और भूजल का अंधाधुंध दोहन किया है। कई इलाकों में, पानी में, इतने भारी तत्व और अन्य खतरनाक रसायन इतनी अधिक मात्रा में प्रवेश कर चुके हैं,कि वह पानी अब किसी भी जीव के उपयोग के लिए सही नहीं है। हमारे देश में स्वच्छ पेयजल के अभाव में होने वाली बीमारियों के उपचार पर भारी भरकम खर्च होते हैं। पानी के  अति दोहन और उसके उपयोग में दक्षता के अभाव के कारण, जल संसाधनों में पानी की कमी की समस्या को, प्रदूषण ने और अधिक बढ़ाया है। हमें अपनी पारंपरिक मान्यताओं और जल संरक्षण के परंपरागत ज्ञान की ओर लौटना होगा, तभी धरती पर जीवन हर रूप में मुस्कुराता रहेगा। भारत में नही, विश्व भर में नदियों को श्रद्धा और सम्मान से देखा जाता है। 

नदिया आदि काल से ही वैश्विक सभ्यता की पोषक रही है। लेकिन आज लगभग सभी नदियों का जल प्रदूषित हो चुका है। नदिया, लगभग, जीवनदायिनी का रूप खो चुकी है। हम जानते हैं, कि जल का मुख्य  स्रोत बारिश है, चाहे वह नदी हो या नहर या जमीन के नीचे मौजूद पानी का अथाह भंडार। सभी स्रोतों में जल की आपूर्ति बारिश ही करती हैं। बारिश के पानी को संचय करने के पारंपरिक ज्ञान को हम भुला बैठे, आज फिर हमें, उस ओर लौटना है।

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