CASTE BASED CENSUS IS NOT A WRONG DEMAND: Part-II गलत नहीं है जाति आधारित जनगणना की मांग—द्वितीय भाग - Tahkikat News

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Monday, 30 August 2021

CASTE BASED CENSUS IS NOT A WRONG DEMAND: Part-II गलत नहीं है जाति आधारित जनगणना की मांग—द्वितीय भाग

गलत नहीं है जाति आधारित जनगणना की मांग—द्वितीय भाग                             (CASTE BASED CENSUS IS NOT A WRONG DEMAND: Part-II)
प्रोफेसर आर पी सिंह,
वाणिज्य विभाग,
गोरखपुर विश्वविद्यालय
E-mail: rp_singh20@rediffmail.com
        Contact : 9935541965
(गतांक से आगे)
जब ईसाई 'वन गॉड' के आह्वान के साथ पूरी दुनिया में फैल रहे थे तो भारत में आम हिन्दू जनता को समझाया जा रहा था कि अपनी जननी जन्मभूमि विश्व में सबसे अच्छी है, अतः यहाँ से बाहर जाने की आवश्यकता नहीं। (आज भी यही गलती लगातार दुहराई जा रही है। यदि अपना देश दुनिया में सबसे अच्छा है तो भी हौसला पूरी धरती पर फैलने का होना चाहिए, न कि अपने देश की आसानी से उपलब्ध सुख-सुविधाएं भोगने का। विश्व-गुरु की श्रेष्ठता का दंभ भरने के बजाय सबसे सीखने, अपनी कमजोरियों को दूर कर औरों को साथ लेकर आगे बढ़ने की मानसिकता ही ज्यादा काम करती है।) जब इस्लामी कट्टरवाद अल्लाह के नाम पर दुनिया भर में काफिरों के सर कलम कर रहा था तो यहाँ के पथ-प्रदर्शक नेता, राजे रजवाड़े तथा जमींदार खुद और जनता को ऊंच-नीच, जातिभेद समेत हरसंभव रूढ़ियों व संकीर्णताओं में उलझे-उलझाते रहे। नतीजा यह महान देश सिकुड़ता गया। घोड़ा मुंह ढक ले इससे संकट टल तो नहीं जाता। 
वास्तव में इन वर्चस्ववादी स्वार्थी नेताओं ने ही जयचंद और मीर जाफरों का काम आसान बनाया और आमजन को संकट में डाला और देश को भी बर्बाद किया। मुस्लिम शासक यहाँ के राजे-रजवाड़ों तथा जमींदारों को साथ लेकर आम जनता का उत्पीड़न करते थे। इन राजे रजवाड़ों तथा जमींदारों ने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए उनका साथ देना प्रायः उपयुक्त समझा, कतिपय महान अपवादों को छोड़कर जिनका आगे उल्लेख है। मुस्लिम शासक यह जानते थे कि ये रजवाड़े तथा जमींदार  सीधे सीधे तो मुसलमान  बनेंगे नहीं, लेकिन यदि उनको अपने साथ हम रखेंगे (और सत्ता बनाए रखने के लालच में वे हमारे साथ आएँगे ही) तो वैसी स्थिति में आम जनता में संदेश जाएगा कि ये रजवाड़े व जमींदार मुसलमानों व मुस्लिम शासकों के प्रभाव में हैं; अतः हमारी भलाई है मुसलमान बनने में ही। मुस्लिम शासक क्या चाहते थे? हिन्दू ऊँच नीच जातियों में बटे रहें और अभिजात्य हिन्दू भी यही चाहते थे और बहुत से आज भी जाने-अनजाने यही चाहते हैं। नतीजा एक तिहाई जनता मुसलमान बन गई और आगे चलकर देश का विभाजन हुआ, फिर भी सांप्रदायिक आतंकवाद की समस्या ज्यों की त्यों। यहाँ गनीमत तो यह रही कि आमजन के मन-मस्तिष्क में भारतीय संस्कृति के प्रति गहरा लगाव और विश्वास था, नहीं तो इन राजे रजवाड़ों तथा जमींदारों की करनी से तो समूची जनता ही ईरान व तुर्की की भांति मुसलमान बन गई होती। राजा सुहेल देव, महाराणा प्रताप, गुरु गोविंद सिंह, छत्रपति शिवाजी जैसे लोग इसके अपवाद थे। और इन लोगों ने अपने समय में दुनिया की सबसे ताकतवर सेना से लोहा लिया। राणा प्रताप ने तो कोल-भीलों-पठानों के साथ मिलकर मुगलो से मोर्चा लिया। इनके कार्य लीक से हटकर थे। इसीलिए जनता के बीच में आज भी इनकी अलग पहचान है। पर ज्यादातर राजे रजवाड़े और जमींदार सत्ता के साथ मिलकर आमजन के उत्पीड़न में लगे रहे।
यही कार्यक्रम ब्रिटिश शासकों ने भी अपनाया और इन्ही राजे-रजवाड़े व जमींदारों ने उनका साथ दिया। हालांकि बाबू कुंवर सिंह, बाबू बंधू सिंह, रानी झाँसी जैसे कुछ लोग इसके अपवाद थे, इनके प्रति आज भी आमजन में अगाध श्रद्धा है।  ब्रिटिश शासकों से लोहा लेने में अलग थलग पड़ उनका क्या हश्र हुआ? यह सब लोग जानते हैं। 
आज हिंदुत्व की ही बात लें तो यह भाजपा, वीएचपी या आर एस एस की संपत्ति नहीं रही है। गांधी और उनकी कांग्रेस ने भी हिंदुत्व और रामराज्य का उपयोग अपने ढंग से करके अपने पक्ष में जनाधार बढ़ाने का उपाय किया था। किंतु गांधी से लेकर के आज तक हिंदुत्व की जो राजनीति हुई इसने भारत को लगातार कमजोर ही किया।  पहले पहले वर्मा भारत से अलग हुआ 1938 में, फिर बटवारा हुआ, फिर तिब्बत भारत के प्रभाव क्षेत्र से बाहर गया। आज हिंदुत्व के कट्टरवादी ध्रुवीकरण की मुहिम में जातियों में बटा हिंदू भले ही एक न हो पा रहा हो किंतु भारत के भीतर और बाहर उसकी प्रतिक्रिया में इस्लामी कट्टरवाद लगातार बढ़ रहा है।  भारत के बाहर अमेरिकी पूंजीवाद का समर्थन पाने की लालसा में एक ओर रूस से दूरी बढ़ी है तो दूसरी तरफ रूस-चीन जैसे देश इस्लामी कट्टरवाद के और नजदीक आए हैं। नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका भी भारत के प्रभाव क्षेत्र से बाहर जा चुके हैं। अब तो और जटिल  स्थितियां बन रही हैं। हमारे नेता सिर्फ अपनी शेखी बघारने में लगे हुए हैं और उनका जाति-धर्मवादी लोकतंत्र इस देश को बर्बाद कर रहा है—वास्तव में यह लोकतंत्र नहीं है, नेता तंत्र और दल तंत्र है। आम जनता का ध्यान केवल फालतू बातों और नेताओं का ध्यान केवल फालतू कामों में लगाया जा रहा है। जातीय समीकरण जिस लोकतंत्र की पचहत्तर सालों से अपरिहार्यता हो वह सही मायने में लोकतंत्र है ही नहीं।  ऐसे लोकतांत्रिक पाखण्ड का चोला उतार कर फेंक देना बेहतर है। समय आ गया है कि  ठोस कदम उठाए जाएँ। 
यहाँ  जापान  से सीखना चाहिए। जापान पर भारत का अच्छा प्रभाव रहा है-काफी सकारात्मक तो बहुत  कुछ नकारात्मक भी। भारत की भांति जापान में भी पहले चतुर्जातीय व्यस्था थी, गुलामी व अछूत (outcastes) प्रथाएं थीं; Daimo (विप्र) तथा Samurai(योद्धा)  जातियों का सामंती प्रभुत्व था। 1862 से 1869  के मेइजी पुनर्स्थापन (Meiji Restoration) दौरान जापान में इन कुरीतियों को एक ही झटके में समाप्त कर दिया गया बिना किसी मसीहा या अवतार का इंतजार किए। कुछ प्रभावशाली सामन्तियों ने विरोध किया तो आधुनिक रूप से गठित सशक्त  सेना ने उन्हे कुचल दिया। अमेरिका का भी समर्थन-दबाव इसमें निहित था। पर, जापान ने हमेशा कर्म और काबिलियत पर भरोसा किया है। एड्मिरल पेरी के नेतृत्व में अमेरिका ने जापानी सम्राट को अधिकार वापस दिलवाए, उक्त आधुनिक सेना का गठन करवाया। इसी सेना के द्वारा दाइमो तथा समुराई जैसे जातिवादी सामंतों को ऐसा दमन करवाया कि जापानी समाज से जातीय व सामंती वर्चस्व, विभाजन व पहिचान हमेशा के लिए समाप्त हो गया। जापान की यह आधुनिक सेना इतनी ताकतवर हो गयी कि इसने 1894 में जापान से पच्चीस गुने बड़े चीन को धूलचटा कोरिया व फार्मोसा (ताइवान) पर कब्जा कर लिया। बहुत बाद में ये द्वीप जापान से स्वतंत्र तो हो गए पर ताइवान और दक्षिणी कोरिया आज जापान से निकटता रख चीन के लिए चुनौती बने हुए हैं।  इसी जापानी सेना ने चालीस गुना बड़े आकार के रूस को 1905 में बुरी तरह शिकस्त दी थी।

काल तो गतिशील है ठहरता कहाँ है!   

यह अच्छी बात है कि दीनदयाल उपाध्याय और तिलक की सोच से बिलकुल अलग अब माननीय सांसद सुब्रमण्यम स्वामी स्पष्टतः साहसपूर्वक मान रहे हैं कि हिंदुत्व को बचना है तो जाति से मुक्त होना होगा। हमारे हित में है कि खुले मस्तिष्क से विज्ञान और टेक्नालाजी के साथ चल दुनिया में अपनी स्वीकार्यता बढ़ावें। समय रहते संकीर्ण स्थान बाधित विचारधारा के बजाय  एक ईश्वरवादी मानव धर्म अर्थात भागवत धर्म की शरण लें वही भागवत धर्म जिसका आह्वान महाभारत की संकल्पना के साथ हुआ। महाभारत के आगे भागवत परंपरा मेन ही ‘बृहद विश्व’ का आह्वान था—‘हरमे पिता च गौरी माता, स्वदेशो भुवन त्रय’ और ‘उदार चरितानाम च वसुधाईव कुटुंबकम’ को भुला दिये। हिंसा से डरने वाले कायर व सुविधाभोगी लोग महाभारत को घर में रखने, पढ़ने और चर्चा करने से बचने लगे और दुर्दशा को प्राप्त होते गए। अब इस ‘बृहद विश्व’ के आह्वान लागू कर ही देना चाहिए। 
मानव धर्म के संकल्प के तहत भारत की सभी जातियों व संप्रदायों को एक झंडे तले लाना आसान होगा। इसमें किसी को संकोच नहीं होगा, मुसलमानों को भी नहीं, कुछ कट्टरपंथियों व कठमुल्लों को छोड़कर  जिन्हें अलग-थलगकर अलग से निपटा जा सकता है। इन सांप्रदायिक अभिव्यक्तियों को पहले जातीय अभिव्यक्तियों में और फिर दोनों को स्थानीय अभिव्यक्तियों में ही सम्मानित व समाहित करने की आवश्यकता है जैसा कि इस लेख के प्रथम भाग में स्पष्टतः उल्लिखित है। बात केवल सांस्कृतिक विमिश्रण और अनुभव-ज्ञान वृद्धि की ओर उन्मुख हो तो कोई समस्या नहीं। पर इन धर्ममतों के मूल में ही कुछ ऐसी समस्या रही है कि ये विभिन्न धर्ममत अपनी श्रेष्ठता और पूर्णता के अहंकार में चूर हो अपने अलावा दूसरे किसी के अस्तित्व को अन्तर्मन से स्वीकार नहीं कर पाते और कठमुल्लों की मेहरबानी से सभ्यताओं में टकराव और मारकाट बढ़ता रहा है।  
आज दुनिया इसाइयत और इस्लाम की गलाकाट प्रतिद्वंद्विता में पिस रही है। भारत भी इस विनाश से अछूता नहीं रह सकता। दुनिया बहुत छोटी हो चुकी है।  राष्ट्रवाद के समाधान कारगर नहीं होने वाले। इससे देश और कमजोर हुआ है। ताकतवर अमेरिकी राष्ट्रवाद का क्या हश्र हो रहा है प्रत्यक्ष दिख रहा है, पहले भी सौ वर्षों में राष्ट्रवाद के ऐसे ही अनुभव सामने आए हैं। राष्ट्रवाद से कोई राष्ट्र मजबूत नहीं होता है। राष्ट्र मजबूत होता है व्यापक दृष्टि और वैश्विक व स्थानीय स्तर पर सबको साथ लेकर चलने से। भारत को मजहबी, जातीय और नस्लीय कट्टरवाद को समूल नष्ट करने में स्वयं ही वैश्विक स्तर पर बड़ी भूमिका निभानी होगी। इसके लिए भीतर के संकीर्ण मानसिकता वाले स्वार्थी नेताओं, संगठनों व गिरोहों से मुक्त होना होगा। एक मजबूत समाज का जयचंद और  मीर जाफर लाख प्रयास करके भी कुछ नहीं बिगाड़ सकते।  
अब तो इस लेख के प्रथम भाग में उल्लिखित मामूली कानूनी परिवर्तन कर जातीय व्यवस्था को आमूल समाप्त कर देना होगा। आगे बढ़ने  के लिए रचनात्मक विध्वंस अपरिहार्य है। स्थितियाँ हाथ से निकलने के बाद के बाद तो बहुत बड़ा खतरा है कि भारत परस्पर विरोधी शक्तियों के द्वंद्व का अखाड़ा बन सकता है। विविधता और बहुरसता बनाए रखने हेतु प्राकृतिक व भूसांस्कृतिक भिन्नताओं को महत्व, मान्यता व पहिचान देना उचित है  जातियों, नस्लभेदों और मत-मतांतरों के स्थान पर; जबकि मजहबी पहिचान को,  धर्ममतवादी वैश्विक अपेक्षाओं व महत्वाकांक्षाओं को स्थानीय अपेक्षाओं के अधीन लाना होगा, इनमें मिला देना होगा। भूसांस्कृतिक विविधताओं में मिलाकर इनका अस्तित्व ही खत्म करने की आवश्यकता है। 


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