Implications of Taliban Dominance over Afghanistan (अफगानिस्तान में तालिबानी वर्चस्व के निहितार्थ) - Tahkikat News

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Wednesday, 18 August 2021

Implications of Taliban Dominance over Afghanistan (अफगानिस्तान में तालिबानी वर्चस्व के निहितार्थ)

अफगानिस्तान में तालिबानी वर्चस्व के निहितार्थ

--प्रोफेसर आर पी सिंह
वाणिज्य विभाग, दी द उ गोरखपुर विश्वविद्यालय
 e-mail: rp_singh20@yahoo.co.in
(Mob.: 9935541965, 8299530659)

निकम्मे, मौकापरस्त और भ्रष्ट नेता किस प्रकार से एक अच्छी खासी व्यवस्था को, एक अच्छे खासे देश को बर्बाद कर सकते हैं आज अफगानिस्तान इस बात की गवाही दे रहा है। थोड़ा सा अच्छा ग्राउंड वर्क करके तालिबान ने बड़ी आसानी से इन नेताओं के हाथों से व्यवस्था को अपने कट्टरपंथी आगोश में ले लिया
महात्मा बुद्ध ने मज़्झिम निकाय पर बल दिया था अर्थात मध्यम मार्ग का अनुसरण करो। मैं बुद्ध का अंधभक्त तो नहीं हूं किंतु आज जिस तरह से ध्रुवीकरण के नाम पर पूरी दुनिया में हर तरफ से अतिवाद व कट्टरपंथ को बढ़ावा दिया जा रहा है उसमें बुद्ध की बात को निश्चित रूप से प्रासंगिक समझता हूं।  यह देखा जा रहा है कि दुनिया में जितने भी मुख्य धर्म मत हैं—ईसाई, इस्लाम, हिंदू, बौद्ध, सिख आदि-- इनमें से हरेक अपनी बात को सही तथा पूरी दुनिया के लिए अनुकरणीय मांगता है बाकी सब को किसी न किसी रूप में गलत ठहराने का उपाय करता है।  हर एक अपनी कमियों को छुपाता है और अपनी खूबियों को आदर्श बता कर के दूसरों पर हावी होने का प्रयास करता है। प्रत्येक धर्म मत अपनी सनक और संकीर्णताओं को को दुनिया पर थोपा कर अच्छी खासी सुंदर धरती को नर्क बनाने पर आमादा है, मानवता का हनन करने पर तुला है, रूढ़ि, जाति, नस्ल या क्षेत्रवाद के नाम पर। भारत से 5 गुना छोटा किंतु महज 3 करोड़ की आबादी वाला पर्वत पठार युक्त खूबसूरत अफगानिस्तान को भी अतिवादी मजहबी आतंकवाद ने नरक में तब्दील कर दिया है। 
दूर कहाँ जायें, हिंदुत्व की ही बात लें तो यह भाजपा या आर एस एस की संपत्ति नहीं रही है। गांधी और उनकी कांग्रेस ने भी हिंदुत्व और रामराज्य का उपयोग अपने ढंग से करके अपने पक्ष में जनाधार बढ़ाने का उपाय किया था। आज भाजपा भी यही कर रही है और उसके राजनीतिक व अन्य सहयोगी भी वही कर रहे हैं। किंतु गांधी से लेकर के आज तक हिंदुत्व की जो राजनीति हुई इसने भारत को लगातार कमजोर ही किया।  पहले पहले वर्मा भारत से अलग हुआ 1938 में, फिर बटवारा हुआ, फिर तिब्बत भारत के प्रभाव क्षेत्र से बाहर गया। आज हिंदुत्व के कट्टरवादी ध्रुवीकरण की मुहिम में जातियों में बटा हिंदू भले ही एक न हो पा रहा हो किंतु भारत के भीतर और बाहर उसकी प्रतिक्रिया में इस्लामी कट्टरवाद लगातार बढ़ रहा है।  भारत के बाहर अमेरिकी पूंजीवाद का समर्थन पाने की लालसा में एक और रूस से दूरी बढ़ी है दूतो सरी तरफ रूस चीन जैसे देश इस्लामी कट्टरवाद के और नजदीक आए हैं। नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, वर्मा और अब तो तालिबानी अफगानिस्तान भी भारत के प्रभाव क्षेत्र से बाहर जा चुका है। अब जो स्थितियां बन रही हैं उसमें कश्मीर और अरुणाचल पर ही खतरा नहीं है बल्कि बंगाल और झारखंड समेत समूचे नॉर्थ ईस्ट और आगे तमिलनाडु पर भी खतरा है।
जिस तरह की बातें आज सोशल मीडिया में आ रही हैं वह साबित करती हैं कि आज हिंदुत्व के कट्टरवादी तालिबान व लश्कर की नकल पर उतारू हैं।  भारत को बचाना है तो धार्मिक, जातीय या किसी भी प्रकार के कट्टरवाद व  अतिवाद का कठोरता से दमन कर मध्य मार्ग का अनुसरण करना होगा जोकि वैश्विक और मानव धर्मी दृष्टिकोण में निहित है।  
हमारे नेता सिर्फ अपनी शेखी बघारनने में लगे हुए हैं और उनका जाति-धर्मवादी लोकतंत्र इस देश को बर्बाद कर रहा है—वास्तव में यह लोकतंत्र नहीं है नेता तंत्र और दल तंत्र है। आम जनता का ध्यान केवल फालतू बातों और नेताओं का ध्यान केवल फालतू कामों में लगाया जा रहा है। समय आ गया है कि लोकतंत्र का ढोंग छोड़कर वास्तविक नैतिक शक्तियों की पहचान कर सत्ता उनको हस्तांतरित की जाय। 
अमेरिका, यूरोप या अन्य किसी पूंजीवादी या साम्यवादी गिरोह का भारत को पिछलग्गू बनने की आवश्यकता नहीं है। भारत को मजहबी और जाति कट्टरवादी को समूल नष्ट करने में स्वयं ही वैश्विक स्तर पर बड़ी भूमिका निभानी होगी। इसके लिए भारत को संकीर्ण मानसिकता वाले स्वार्थी नेताओं, संगठनों व गिरोहों से मुक्त होना होगा, और अतिवादी तथा धर्ममतवादी वैश्विक अपेक्षाओं को स्थानीय अपेक्षाओं के अधीन लाना होगा, इनमें मिला देना होगा। दुनिया छोटी हो चुकी है राष्ट्रवाद के समाधान कारगर नहीं होने वाले। इससे देश और कमजोर हुआ है। संकीर्णताओं को छोड़ समय रहते एक ईश्वर और वसुधईव कुटुंबकम के आह्वान युक्त ‘भागवत धर्म’ की शरण लें तथा खुले मस्तिष्क से विज्ञान और टेक्नालाजी के साथ चल दुनिया में अपनी स्वीकार्यता बढ़ावे।

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