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Thursday, 9 September 2021

माँ मंगला गौरी के पूजा से मनचाहा जीवन साथी और अपने जीवन साथी के लंबी उम्र प्राप्त होती है

कैलाश सिंह विकास वाराणसी

माँ मंगला गौरी के पूजा से मनचाहा जीवन साथी और अपने जीवन साथी के लंबी उम्र प्राप्त होती है

आज के दिन समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली देवी माँ मंगला गौरी के पूजा से मनचाहा जीवन साथी और अपने जीवन साथी के लंबी उम्र के लिए यहां प्राचीन समय से ही (हरतालिका तीज के दिन)माताएं और बहने दर्शन करती आई है ।

मंगला गौरा की स्थापना स्वयं सूर्य देव द्वारा माता पार्वती के रूप में किया गया था , बाद में माता पार्वती के वरदान स्वरूप इनका नाम मंगला गौरी पड़ा निसंतान दंपत्ती भी यहां संतान की मनोकामना से दर्शन पूजन करते है और अपने इक्षित अभिलाषा का वरदान प्राप्त करते है ।
हरतालिका तीज की कथा

एक कथा के अनुसार माँ पार्वती ने अपने पूर्व जन्म में भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए हिमालय पर गंगा के तट पर अपनी बाल्यावस्था में अधोमुखी होकर घोर तप किया। इस दौरान उन्होंने अन्न का सेवन नहीं किया। काफी समय सूखे पत्ते चबाकर ही काटे और फिर कई वर्षों तक उन्होंने केवल हवा ही ग्रहण कर जीवन व्यतीत किया। माता पार्वती की यह स्थिति देखकर उनके पिता अत्यंत दुःखी थे।
इसी दौरान एक दिन महर्षि नारद भगवान विष्णु की ओर से पार्वतीजी के विवाह का प्रस्ताव लेकर माँ पार्वती के पिता के पास पहुँचे जिसे उन्होंने सहर्ष ही स्वीकार कर लिया। पिता ने जब बेटी पार्वती को उनके विवाह की बात बतलाई तो वे बहुत दु:खी हो गईं और जोर-जोर से विलाप करने लगीं।

फिर एक सखी के पूछने पर माता ने उसे बताया कि वे यह कठोर व्रत भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कर रही हैं, जबकि उनके पिता उनका विवाह श्री विष्णु से कराना चाहते हैं। तब उनकी सहेली ने उनका हरण कर के कही और ले गयी फिर सहेली की सलाह पर माता पार्वती घने वन में चली गईं और वहाँ एक गुफा में जाकर भगवान शिव की आराधना में लीन हो गईं। माँ पार्वती के इस तपस्वनी रूप को नवरात्रि के दौरान माता शैलपुत्री के नाम से पूजा जाता है।
आज के दिन अपने सखी द्वारा हरण करने और व्रत रखने  के कारण ही आज के दिन का नाम हरतालिका तीज पड़ा

भाद्रपद शुक्ल तृतीया तिथि के हस्त नक्षत्र मे माता पार्वती ने रेत से शिवलिंग का निर्माण किया और भोलेनाथ की स्तुति में लीन होकर रात्रि जागरण किया। तब माता के इस कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और इच्छानुसार उनको अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया।

【इसी कारण काशी में तभी से हर माह के तृतीया तिथि को मंगला गौरी की यात्रा की जाती है】

मान्यता है कि इस दिन जो महिलाएं विधि-विधानपूर्वक और पूर्ण निष्ठा से इस व्रत को करती हैं, वे अपने मन के अनुरूप पति को प्राप्त करतीं हैं। साथ ही यह पर्व दांपत्य जीवन में खुशी बनाए रखने के उद्देश्य से भी मनाया जाता है।
 


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