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Saturday, 11 September 2021

इस रणनीति के अलावा भाजपा के विजय रथ को रोकना मुश्किल नहीं नामुमकिन है

कृपा शंकर चौधरी

इस रणनीति के अलावा भाजपा के विजय रथ को रोकना मुश्किल नहीं नामुमकिन है 

लोकतांत्रिक देशों में चुनाव लडने वाले पार्टियों से जनता का जुडाव स्थान काल पात्र के अनुसार बदलता रहता है। ज्यादा गंभीर स्थिति तब होती है जब वह देश कई जातियां, धर्मों और निम्न शिक्षा के अंतर्गत आता हो जैसे की भारत। मामला तब और असमंजस भरा हो सकता है जब जनता के सामने ग़रीबी, बेरोजगारी, जैसी चुनौती हो। इस स्थिति में जनता को अपने हिसाब से साधना किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिए चिंतनीय विषय होता है।

जैसा की लेख के शीर्षक में आपने पढ़ा वह वास्तव में सत्य है। वर्तमान भारत सरकार जिस भारतीय जनता पार्टी से ताल्लुक रखती है वह उपरोक्त सभी परिस्थितियों से सामंजस्य स्थापित कर आगे बढ़ रही है। भविष्य में ऐसा भी हो सकता है कि कई दशकों तक कोई टक्कर देने वाला न हो। स्पष्ट करना चाहूंगा कि कैसे ? एक एक बिंदुओं को आधार बनाकर बताना चाहुंगा और सबसे पहले धर्म पर चर्चा करूंगा।

भारत में मुख्यतया चार धर्म को मानने वाले लोग जैसे हिन्दू , मुस्लिम, सिख, ईसाई का समावेश है। इसके अलावा अन्य धर्म को भी मानने वाले हैं जो घूम घुमा कर सनातन धर्म से जुड़ा है। इस स्थिति में यदि कोई राजनीतिक पार्टी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से धर्म की राजनीति करती है तो उसके सामने वही टिक पाएगा जो उससे अच्छा धर्म की राजनीति करने में माहिर हो। संख्या बल की बात करें तो भारत के किसी अन्य धर्म को मानने वालों की संख्या सनातन धर्म के लोगों से कम है। इस दशा में आप समझ सकते हैं कि जिस पार्टी का ताल्लुक सीधे धार्मिक लोगों से जुड़े हो उनका टक्कर कौन दे सकता है।

जातिगत समीकरण देखने पर पता चलता है कि लगभग सभी छोटी बड़ी पार्टियों के अपने मुख्य वोटर हैं। भारतीय जनता पार्टी की बात करें तो इनका भी अपना वोट बैंक है इसके अलावा धार्मिक जुड़ाव से सम्बंधित कार्य पर फोकस होने के कारण लगभग सभी सनातन धर्म को मानने वाले जातियों के कुछ लोग प्रभावित होकर इनसे जुड़ जातें हैं। इस दशा में भी भारतीय जनता पार्टी सबल दिखती है। इसके अलावा एक अन्य कारण राष्ट्रवाद का है। इस मुद्दे पर भी भारतीय जनता पार्टी ने मुख्य तौर पर काम किया है जबकि दूसरी बड़ी पार्टी कांग्रेस अपने आप को लोगों के दिलों में स्थापित करने में विफल रही है।

इस दशा में हम कह सकते हैं कि भारतीय जनता पार्टी का विजय रथ आगे बढ़ता जा रहा है और उसका तोड़ वहीं से संभव है जब उसके जैसा सोच रखते हुए उससे बढ़िया रणनीति बनाई जाएं।

इन कारणों से घुटने टेक सकती है भाजपा

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनाव में अधिकांश बार यह होता है कि एक विशेष प्रकार कि आंधी चलती है और सत्ता सुख पाने में वे लोग भी नदी पार हो जाते हैं जिन्हें पतवार चलाना नहीं आता है। भारतीय जनता पार्टी के साथ भी ऐसा ही कुछ कई बार हुआ जिसमें व्यक्ति विशेष, धर्म, राष्ट्रवाद की आंधी में सरकार बनी है।

आलोचक कह सकते हैं कि यदि इसी प्रकार होता है तो हाल ही हुए बंगाल के चुनाव में भाजपा को क्यों हार का सामना करना पड़ा है? जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि भाजपा अन्य पार्टियों की रणनीति बनाने की तुलना में आगे की रणनीति पर काम करती है जिसके सामने अन्य लोगों की रणनीति बौना साबित हो जाती है। किन्तु कई परिस्थितियों में भाजपा को भी मुंह की खानी पड़ती है किन्तु वह ऐसी स्थिति होती है जो भाजपा की रणनीति को टक्कर देने योग्य बना दी जाती है। बंगाल की बात करें तो वहां न धर्म न जाति न राष्ट्रवाद का का खेल हुआ बल्कि वहां भाषा को आधार बनाकर लोगों में बंगला बनाम अन्य की आंधी चलाई गई जिसमें ममता बनर्जी सफल भी रही। पाठकों को बताना चाहुंगा कि भारत के कई ऐसे प्रदेश है जहां अपने भाषा को काफी महत्व दिया जाता है जिसमें एक बंगाल भी है। भाजपा के बंगाली बोलने वाले स्थाई कार्यकत्र्ताओं की कमी के कारण को भी भाजपा के हार के रूप में देखा जा सकता है।

भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिए रणनीतिकार अलग अलग रणनीति बनाने पर लगें हैं किन्तु आगामी कई राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव की बात करें तो भाजपा का तोड़ नहीं दिख रहा है। किन्तु कई ऐसे विषय है जिन्हें आधार बनाया गया तो भाजपा के लिए असमंजस की स्थिति हो सकती है।  इन विषयों में चुनाव के दरम्यान किसान आंदोलन को भुनाना, जातिगत आधार पर छोटी छोटी पार्टियों का एक मंच पर आना या किसी ऐसे पार्टी का उदय होना है जो जाति धर्म मजहब से उपर उठकर मानवतावाद पर केन्द्रित होकर काम करती हो का भाजपा को टक्कर देना है ।

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