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Sunday, 27 March 2022

एचयूएफ के रूप में हिंदू व्यसायी परिवारों पर साम्प्रदायिक कर क्यों चल रहा है ?

एचयूएफ के रूप में हिंदू व्यसायी परिवारों पर साम्प्रदायिक कर क्यों चल रहा है ?

लेखक- प्रोफेसर आर पी सिंह,रिनेसां यूनिवर्सल, गोरखपुर

भारतीय संविधान में अपेक्षा की जाती है कि देश पंथनिरपेक्ष व्यवस्था के रूप में कार्य करेगा। सरकारें आम जनता से तो पंथनिरपेक्ष आचरण की अपेक्षा करती हैं किंतु  स्वयं पंथनिरपेक्ष कभी नहीं रह पाई। इसका बड़ा उदाहरण हिंदू अविभाजित परिवार (एचयूएफ) का है जिसे न केवल हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में शामिल किया गया बल्कि आयकर अधिनियम में इसे व्यक्ति के रूप में माना गया है।
एचयूएफ कर बचाव के उपकरण के रूप में प्रचारित किया जाता रहा है किंतु वास्तव में यदि कर बचाने का उपकरण है तो फिर हिंदू परिवारों पर ही क्यों? गैर हिंदू परिवारों पर लागू क्यों नहीं किया जाता?
वास्तविकता कुछ और है। एचयूएफ की व्यवस्था निम्न तथा मध्यम आय वर्ग के हिंदू व्यवसायी परिवारों के लिए उपयोगी नहीं है, बल्कि उद्यमिता को हतोत्साहित करने वाला है भले ही साझेदारी एवं कंपनी की तुलना में उच्च आय वर्ग के लिए लाभदायक प्रतीत होता है।
आजादी के बाद, सहकारी व सामूहिक उद्यमों से हिंदुओं को हतोत्साहित करने के लिए हर संभव उपाय किए गए हैं। उदाहरण के लिए  हिंदू अविभाजित परिवार (एचयूएफ) एक स्पष्ट उदाहरण है। एचयूएफ की शुरुआत वैसे तो 1917 में ब्रिटिश सरकार की फूट डालो और राज करो की नीति के तहत की गई थी। 1956 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में भी इसे शामिल किया गया। इस अवधारणा को भारतीय आयकर अधिनियम, 1961 में शामिल करने के साथ गति मिली। हिंदू अविभाजित परिवारों द्वारा व्यवसायों के लिए प्रोत्साहन उपाय के रूप में इसका अत्यधिक प्रचार किया गया है। पर, इसके वास्तविक निहितार्थ अत्यधिक नकारात्मक हैं, यहां तक कि हिंदू परिवारों पर एक जज़िया कर से भी अधिक हैं। हिंदू परिवार के कुछ सदस्यों द्वारा किए गए किसी भी व्यवसाय के लिए, उस पर पहले स्तर पर सामूहिक रूप से कर लगाया जाएगा, जिससे उच्च स्लैब में कर देयता होगी, फिर सदस्यों में मुनाफा बटेंगा। यदि वही व्यवसाय एक गैर-हिंदू परिवार द्वारा किया जाता है, तो पहले सदस्यों को मुनाफे में हिस्सा मिलेगा और फिर प्रत्येक सदस्य पर व्यक्तिगत रूप से कर लगाया जाएगा, जिससे निचले स्लैब में शून्य या बहुत कम कर देयता होगी। 
इसको समझने के लिए, आइए हम एक सरलीकृत मामले को लें। मान लीजिए, एक हिंदू परिवार के तीन सदस्य पिछले वर्ष में 30 लाख रुपये का शुद्ध कर योग्य लाभ कमाते हैं। एचयूएफ के रूप में कर देयता पूरे परिवार के लिए 7,12,500 रुपये और प्रत्येक सदस्य के लिए 2,37,500 रुपये होगी। लेकिन अगर यही कारोबार किसी गैर हिंदू परिवार द्वारा चलाया जाता है, तो पूरे परिवार पर एचयूएफ के रूप में कर नहीं लगाया जाएगा। बल्कि प्रत्येक सदस्य को 30 लाख रुपये के पूरे लाभ में हिस्सा मिलेगा। यदि लाभ को समान रूप से साझा किया जाता है, तो 10 लाख रुपये के व्यक्तिगत कर देयता पर 112,500 रुपये की व्यक्तिगत कर देयता एचयूएफ मामले में 2,37,500 रुपये की तुलना में। यह मानते हुए कि दोनों मामलों में सदस्यों की कोई अन्य आय नहीं है, गैर-एचयूएफ मामले में कुल कर देयता 3,37,500 रुपये होगी, जबकि एचयूएफ मामले में यह 7,12,500 रुपये। इस तरह, एक हिंदू परिवार द्वारा व्यापार पर कर-देयता एक गैर-हिंदू परिवार की तुलना में दोगुने से अधिक है।
क्या किसी भी हिंदू परिवार के लिए सफल व्यवसाय करने हेतु यह गैर-हिन्दुओं के मुकाबले हतोत्साहित करना नहीं है? हिंदुओं के साथ भेदभाव जैसे जजिया को खत्म करने के लिए एचयूएफ को हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम और आयकर अधिनियम से हटा दिया जाना चाहिए। सरकार द्वारा इस ओर ध्यान देने के लिए आठ वर्षों का समय पर्याप्त है।
 यह बात भी परेशान करने वाला है कि एचयूएफ पर एक व्यावसायिक इकाई की तरह व्यवसाय के लिए कर लगाया जाता है, लेकिन कंपनी व्यवसायों पर लागू निम्न कर दरें और कोपोरेट रियायतें  एचयूएफ के लिए उपलब्ध नहीं हैं। क्या नेहरू काल से मध्यम वर्ग के हिंदू परिवारों में उद्यमशीलता की भारी कमी के लिए यह व्यवस्था जिम्मेदार नहीं है? यह समझना मुश्किल नहीं है कि हम अब तक किस तरह की धर्मनिरपेक्षता का अनुसरण करते रहे हैं और निम्न या मध्यम वर्ग के हिंदू परिवारों को व्यापार या आर्थिक उद्यम करने से कैसे हतोत्साहित किया गया है!  यह भी विचारणीय है कि एचयूएफ पर आय कराधान किस हद तक संवैधानिक पंथनिरपेक्षता, समाजवाद और समानता के अनुरूप है।
 

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